Hindi Poem

मेरा शीश नवा दो

Gitanjali

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी का नाम सुनते ही मन आदर से परिपूर्ण हो उठता है| विश्वविख्यात कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की  लेखन कृति हमारे साहित्य जगत की बहुमूल्य धरोहरों में शामिल है| इन्हे गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है| रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की देन 2 खूबसूरत रचनाओं को बाँग्लादेश और भारत के राष्टगान के रूप में जाना जाता है| जो क्रमशः “आमार सोनार बाँग्ला” और “जन गण मन” हैं |
वैसे तो रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की हर एक कृति ही अदभुत है जिसकी तुलना नहीं की जा सकती| परन्तु उनकी कुछ कृति ऐसी भी हैं जिन्हे पढ़ कर मन अत्यंत उत्साहित हो उठता है|
दोस्तों आज हम रवींद्रनाथ टैगोर जी की एक अदभुत प्रेरक कृति लेकर आये हैं “गीतांजलि”
जिसमे रविंद्र नाथ टैगोर अपने शीश को प्रभु के चरण की धूल में अर्पित करते हैं क्योंकि वो मानते हैं कि वह प्रभु के चरणों के योग्य नहीं हैं परंतु हो सकता है वह उनके चरणों की धूल के बराबर हो, इसलिए वह प्रभु से निवेदन करते हैं की ” मेरे अहंकार को मेरे ही आंशुओ के जल में डूबा दीजिए ”

मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
अपने को गौरव देने को
अपमानित करता अपने को,
घेर स्वयं को घूम-घूम कर
मरता हूं पल-पल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
अपने कामों में न करूं मैं
आत्म-प्रचार प्रभो;
अपनी ही इच्छा मेरे
जीवन में पूर्ण करो।
मुझको अपनी चरम शांति दो
प्राणों में वह परम कांति हो
आप खड़े हो मुझे ओट दें
हृदय-कमल के दल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-ज
में।

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी को बंगाली भाषा के संस्करण की उत्पत्ति का श्रेय दिया जाता है क्यूंकि इनकी रचनाओं के अंदर मनुष्य और ईश्वर के बीच चिरस्थायी सम्पर्क अलग-अलग रूपों में उभर कर आता है । इन्होने अपने जीवनकाल में कई उपन्यास, निबंध, लघु कथाएँ, यात्रावृन्त और नाटक लिखे हैं । साहित्य की शायद ही ऐसी कोई शाखा हो, जिनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की रचना न हो – कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला – सभी विधाओं में उन्होंने रचना की है । परन्तु गद्य में लिखी उनकी छोटी कहानियों को सबसे अधिक लोकप्रिय माना जाता है|